Rhythm Society

खुली किताब – An Open Book

पन्नों के मोड़े हुए कोनों में फंसे दिल का ख़ाब हूँ // गुफ़्तगू से चुराए आँसुओं का सैलाब हूँ... // साथ रची तुम्हारी कविता हूँ... वो कहती है - मैं खुली किताब हूँ।

वो कहती है – मैं
खुली किताब हूँ।
पन्नों के मोड़े हुए कोनों में फंसे दिल का ख़ाब हूँ।

लफ़्ज़ों की स्याही से रंग दो अगर,
कुछ दो पल दिल की होली खेलो संग अगर,
गुफ़्तगू से चुराए आँसुओं का सैलाब हूँ…
खुली किताब हूँ।

आँखों से होश के नक़ाब हटाकर जो देखो,
नज़रों से नोश रूह के फर्माकर, यूँ चखलो,
तो
काँपती तुम्हारी साँसों में घुले एक आगोश का शबाब हूँ…
बस एक खुली किताब हूँ।

इन पन्नों में कँवल खरोंच हैं – ज़रा आहिस्ता!
लकीर शब्दों में तरण कोई खोज है
खुले लिफ़ाफ़े भी, संग काग़ज़ के, छिपा कोई अंदाज़ रखते हैं
बिखरे पन्ने, हर बरसों से पढ़ी किताब के भी संग, एक माज़ रखते हैं;

इस माज के कदमों का साथ
पलटते हुए पन्नों का साज़
किताबों में कहानिया नई सजाता है
सुनहरी या कारी, तुम्हारी अपनी बनाता है।

किनारों कोनों में मोड़कर रखी तुम्हारी जान पाओगे, मुस्कान पाओगे
बाज़ुओं में नहीं, जान हथेली पर पाओगे
दिल से खोना नहीं,
साथ रची तुम्हारी कविता हूँ…
वो कहती है – मैं खुली किताब हूँ।

~आपकी Ojhal


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